श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.36

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बालं स्त्रियं जडम्।

प्रपन्‍नं विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित्॥ ३६

mattaṃ pramattamunmattaṃ suptaṃ bālaṃ striyaṃ jaḍam|

prapannaṃ virathaṃ bhītaṃ na ripuṃ hanti dharmavit|| 36

अर्थ

धर्मवेत्ता पुरुष असावधान, मतवाले, पागल, सोये हुए, बालक, स्त्री, विवेकज्ञानशून्य, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रुको कभी नहीं मारते॥ ३६॥✎ 66 67 68

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #66 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #67 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #68 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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