श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

दृष्ट्वास्त्रतेजस्तु तयोस्त्रीँल्लोकान् प्रदहन्महत्।

दह्यमानाः प्रजाः सर्वाः सांवर्तकममंसत॥ ३१

dṛṣṭvāstratejastu tayostrīm̐llokān pradahanmahat|

dahyamānāḥ prajāḥ sarvāḥ sāṃvartakamamaṃsata|| 31

अर्थ

तीनों लोकोंको जलानेवाली उन दोनों अस्त्रोंकी बढ़ी हुई लपटोंसे प्रजा जलने लगी और उसे देखकर सबने यही समझा कि यह प्रलयकालकी सांवर्तक अग्‍नि है॥ ३१॥✎ 66 67 68

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #66 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #67 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #68 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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