श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

इति प्रियां वल्गुविचित्रजल्पैः स सान्त्वयित्वाच्युतमित्रसूतः।

अन्वाद्रवद्दंशित उग्रधन्वा कपिध्वजो गुरुपुत्रं रथेन॥ १७

iti priyāṃ valguvicitrajalpaiḥ sa sāntvayitvācyutamitrasūtaḥ|

anvādravaddaṃśita ugradhanvā kapidhvajo guruputraṃ rathena|| 17

अर्थ

अर्जुनने इन मीठी और विचित्र बातोंसे द्रौपदीको सान्त्वना दी और अपने मित्र भगवान् श्रीकृष्णकी सलाहसे उन्हें सारथि बनाकर कवच धारणकर और अपने भयानक गाण्डीव धनुषको लेकर वे रथपर सवार हुए तथा गुरुपुत्र अश्‍वत्थामाके पीछे दौड़ पड़े॥ १७॥

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