श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सकृद् यद् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ।

मत्कामः शनकैः साधुः सर्वान्मुञ्चति हृच्छयान्॥ २३

sakṛd yad darśitaṃ rūpametatkāmāya te'nagha|

matkāmaḥ śanakaiḥ sādhuḥ sarvānmuñcati hṛcchayān|| 23

अर्थ

निष्पाप बालक! तुम्हारे हृदयमें मुझे प्राप्त करनेकी लालसा जाग्रत् करनेके लिये ही मैंने एक बार तुम्हें अपने रूपकी झलक दिखायी है। मुझे प्राप्त करनेकी आकांक्षासे युक्त साधक धीरे-धीरे हृदयकी सम्पूर्ण वासनाओंका भलीभाँति त्याग कर देता है॥ २३॥✎ 55 56 57

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #55 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसिर → को सिर
  • #56 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #57 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,

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