श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ध्यायतश्‍चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा।

औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः॥ १७

dhyāyataścaraṇāmbhojaṃ bhāvanirjitacetasā|

autkaṇṭhyāśrukalākṣasya hṛdyāsīnme śanairhariḥ|| 17

अर्थ

भक्तिभावसे वशीकृत चित्तद्वारा भगवान्‌के चरण-कमलोंका ध्यान करते ही भगवत्-प्राप्तिकी उत्कट लालसासे मेरे नेत्रोंमें आँसू छलछला आये और हृदयमें धीरे-धीरे भगवान् प्रकट हो गये॥ १७॥

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