सनातन ब्रह्मतत्त्वको भी आपने खूब विचारा है और जान भी लिया है। फिर भी प्रभु! आप अकृतार्थ पुरुषके समान अपने विषयमें शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ४॥
जिज्ञासितमधीतं च यत्तद्ब्रह्म सनातनम्।
अथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो॥ ४
सनातन ब्रह्मतत्त्वको भी आपने खूब विचारा है और जान भी लिया है। फिर भी प्रभु! आप अकृतार्थ पुरुषके समान अपने विषयमें शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.5.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 97) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/5/4/