श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.28

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इत्थं शरत्प्रावृषिकावृतू हरे-

र्विशृण्वतो मेऽनुसवं यशोऽमलम्।

संकीर्त्यमानं मुनिभिर्महात्मभि-

र्भक्तिः प्रवृत्ताऽऽत्मरजस्तमोपहा॥ २८

itthaṃ śaratprāvṛṣikāvṛtū hare-

rviśṛṇvato me'nusavaṃ yaśo'malam|

saṃkīrtyamānaṃ munibhirmahātmabhi-

rbhaktiḥ pravṛttā''tmarajastamopahā|| 28

अर्थ

इस प्रकार शरद् और वर्षा—इन दो ऋतुओंमें तीनों समय उन महात्मा मुनियोंने श्रीहरिके निर्मल यशका संकीर्तन किया और मैं प्रेमसे प्रत्येक बात सुनता रहा। अब चित्तके रजोगुण और तमोगुणको नाश करनेवाली भक्तिका मेरे हृदयमें प्रादुर्भाव हो गया॥ २८॥✎ 48 49

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #48 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #49 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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