श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्यक्‍त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरे-

र्भजन्‍नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि।

यत्र क्‍व वाभद्रमभूदमुष्य किं

को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥ १७

tyaktvā svadharmaṃ caraṇāmbujaṃ hare-

rbhajannapakvo'tha patettato yadi|

yatra kva vābhadramabhūdamuṣya kiṃ

ko vārtha āpto'bhajatāṃ svadharmataḥ|| 17

अर्थ

जो मनुष्य अपने धर्मका परित्याग करके भगवान्‌के चरणकमलोंका भजन-सेवन करता है—भजन परिपक्‍व हो जानेपर तो बात ही क्या है—यदि इससे पूर्व ही उसका भजन छूट जाय तो क्या कहीं भी उसका कोई अमंगल हो सकता है? परन्तु जो भगवान्‌का भजन नहीं करते और केवल स्वधर्मका पालन करते हैं, उन्हें कौन-सा लाभ मिलता है॥ १७॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति

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