॥ श्रीहरिः ॥
तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनिः।
पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम्॥ ३३
tamabhijñāya sahasā pratyutthāyāgataṃ muniḥ|
pūjayāmāsa vidhivannāradaṃ surapūjitam|| 33
अर्थ
उन्हें आया देख व्यासजी तुरन्त खड़े हो गये। उन्होंने देवताओंके द्वारा सम्मानित देवर्षि नारदकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
नैमिषीयोपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः१॥ ४॥
तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनिः।
पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम्॥ ३३
उन्हें आया देख व्यासजी तुरन्त खड़े हो गये। उन्होंने देवताओंके द्वारा सम्मानित देवर्षि नारदकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.4.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 97) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/4/33/टिप्पणियाँ
- १
यहाँ प्राचीन प्रतिमें ‘नारदागमनं’ इतना पाठ अधिक है।
(मुद्रित पृष्ठ 97)