श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.26

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः।

सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद‍्धृदयं ततः॥ २६

evaṃ pravṛttasya sadā bhūtānāṃ śreyasi dvijāḥ|

sarvātmakenāpi yadā nātuṣyaddhṛdayaṃ tataḥ|| 26

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! यद्यपि व्यासजी इस प्रकार अपनी पूरी शक्तिसे सदा-सर्वदा प्राणियोंके कल्याणमें ही लगे रहे, तथापि उनके हृदयको सन्तोष नहीं हुआ॥ २६॥✎ 36 37 38 39

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #36 शब्दोंके बीचका स्थान: कोभी → को भी
  • #37 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #38 शब्दोंके बीचका स्थान: कोप्राप्त → को प्राप्त
  • #39 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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