श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.45

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहात्।

सोऽहं वः श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामति॥ ४५

ahaṃ cādhyagamaṃ tatra niviṣṭastadanugrahāt|

so'haṃ vaḥ śrāvayiṣyāmi yathādhītaṃ yathāmati|| 45

अर्थ

उस समय वे परमर्षियोंसे घिरे हुए आमरण अनशनका व्रत लेकर गंगातटपर बैठे हुए थे। भगवान् श्रीकृष्ण जब धर्म, ज्ञान आदिके साथ अपने परमधामको पधार गये, तब इस कलियुगमें जो लोग अज्ञानरूपी अन्धकारसे अंधे हो रहे हैं, उनके लिये यह पुराणरूपी सूर्य इस समय प्रकट हुआ है। शौनकादि ऋषियो! जब महातेजस्वी श्रीशुकदेवजी महाराज वहाँ इस पुराणकी कथा कह रहे थे, तब मैं भी वहाँ बैठा था। वहीं मैंने उनकी कृपापूर्ण अनुमतिसे इसका अध्ययन किया। मेरा जैसा अध्ययन है और मेरी बुद्धिने जितना जिस प्रकार इसको ग्रहण किया है, उसीके अनुसार इसे मैं आपलोगोंको सुनाऊँगा॥ ४३—४५॥

यह अर्थ श्लोक 43–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
नैमिषीयोपाख्याने तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥

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