श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स वेद धातुः पदवीं परस्य दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः।

योऽमायया संततयानुवृत्त्या भजेत तत्पादसरोजगन्धम्॥ ३८

sa veda dhātuḥ padavīṃ parasya durantavīryasya rathāṅgapāṇeḥ|

yo'māyayā saṃtatayānuvṛttyā bhajeta tatpādasarojagandham|| 38

अर्थ

चक्रपाणि भगवान्‌की शक्ति और पराक्रम अनन्त है—उनकी कोई थाह नहीं पा सकता। वे सारे जगत‍्के निर्माता होनेपर भी उससे सर्वथा परे हैं। उनके स्वरूपको अथवा उनकी लीलाके रहस्यको वही जान सकता है, जो नित्य-निरन्तर निष्कपटभावसे उनके चरणकमलोंकी दिव्य गन्धका सेवन करता है—सेवाभावसे उनके चरणोंका चिन्तन करता रहता है॥ ३८॥✎ 33 34

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #33 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #34 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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