श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.2

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः।

नाभिह्रदाम्बुजादासीद्ब्रह्मा विश्‍वसृजां पतिः॥ २

yasyāmbhasi śayānasya yoganidrāṃ vitanvataḥ|

nābhihradāmbujādāsīdbrahmā viśvasṛjāṃ patiḥ|| 2

अर्थ

उन्होंने कारण-जलमें शयन करते हुए जब योगनिद्राका विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवरमेंसे एक कमल प्रकट हुआ और उस कमलसे प्रजापतियोंके अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्‍न हुए॥ २॥

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