श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया।

सदसद्रूपया चासौ गुणमय्यागुणो विभुः॥ ३०

sa evedaṃ sasarjāgre bhagavānātmamāyayā|

sadasadrūpayā cāsau guṇamayyāguṇo vibhuḥ|| 30

अर्थ

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत हैं, फिर भी अपनी गुणमयी मायासे, जो प्रपंचकी दृष्टिसे है और तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं है—उन्होंने ही सर्गके आदिमें इस संसारकी रचना की थी॥ ३०॥

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