श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एवं प्रसन्‍नमनसो भगवद्भक्तियोगतः।

भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते॥ २०

evaṃ prasannamanaso bhagavadbhaktiyogataḥ|

bhagavattattvavijñānaṃ muktasaṅgasya jāyate|| 20

अर्थ

इस प्रकार भगवान्‌की प्रेममयी भक्तिसे जब संसारकी समस्त आसक्तियाँ मिट जाती हैं, हृदय आनन्दसे भर जाता है, तब भगवान्‌के तत्त्वका अनुभव अपने-आप हो जाता है॥ २०॥✎ 27

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #27 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें