श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

प्रशान्तमासीनमकुण्ठमेधसं

मुनिं नृपो भागवतोऽभ्युपेत्य।

प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृताञ्जलि-

र्नत्वा गिरा सूनृतयान्वपृच्छत्॥ ३१

praśāntamāsīnamakuṇṭhamedhasaṃ

muniṃ nṛpo bhāgavato'bhyupetya|

praṇamya mūrdhnāvahitaḥ kṛtāñjali-

rnatvā girā sūnṛtayānvapṛcchat|| 31

अर्थ

जब प्रखरबुद्धि श्रीशुकदेवजी शान्तभावसे बैठ गये, तब भगवान्‌के परम भक्त परीक्षित‍्ने उनके समीप आकर और चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया। फिर खड़े होकर हाथ जोड़कर नमस्कार किया। उसके पश्चात् बड़ी मधुर वाणीसे उनसे यह पूछा॥ ३१॥

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