श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.12

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सुखोपविष्टेष्वथ तेषु भूयः

कृतप्रणामः स्वचिकीर्षितं यत्।

विज्ञापयामास विविक्तचेता

उपस्थितोऽग्रेऽभिगृहीतपाणिः ॥ १२

sukhopaviṣṭeṣvatha teṣu bhūyaḥ

kṛtapraṇāmaḥ svacikīrṣitaṃ yat|

vijñāpayāmāsa viviktacetā

upasthito'gre'bhigṛhītapāṇiḥ || 12

अर्थ

जब सब लोग आरामसे अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये, तब महाराज परीक्षित‍्ने उन्हें फिरसे प्रणाम किया और उनके सामने खड़े होकर शुद्ध हृदयसे अंजलि बाँधकर वे जो कुछ करना चाहते थे, उसे सुनाने लगे॥ १२॥

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