श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.48

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तिरस्कृता विप्रलब्धाः शप्ताः क्षिप्ता हता अपि।

नास्य तत् प्रतिकुर्वन्ति तद्भक्ताः प्रभवोऽपि हि॥ ४८

tiraskṛtā vipralabdhāḥ śaptāḥ kṣiptā hatā api|

nāsya tat pratikurvanti tadbhaktāḥ prabhavo'pi hi|| 48

अर्थ

भगवान्‌के भक्तोंमें भी बदला लेनेकी शक्ति होती है, परंतु वे दूसरोंके द्वारा किये हुए अपमान, धोखेबाजी, गाली-गलौज, आक्षेप और मार-पीटका कोई बदला नहीं लेते॥ ४८॥

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