शौनकजी! वे भूख-प्याससे छटपटा रहे थे, इसलिये एकाएक उन्हें ब्राह्मणके प्रति ईर्ष्या और क्रोध हो आया। उनके जीवनमें इस प्रकारका यह पहला ही अवसर था॥ २९॥
अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः।
ब्राह्मणं प्रत्यभूद् ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च॥ २९
शौनकजी! वे भूख-प्याससे छटपटा रहे थे, इसलिये एकाएक उन्हें ब्राह्मणके प्रति ईर्ष्या और क्रोध हो आया। उनके जीवनमें इस प्रकारका यह पहला ही अवसर था॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 172) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/29/