श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

विप्रकीर्णजटाच्छन्‍नं रौरवेणाजिनेन च।

विशुष्यत्तालुरुदकं तथाभूतमयाचत॥ २७

viprakīrṇajaṭācchannaṃ rauraveṇājinena ca|

viśuṣyattālurudakaṃ tathābhūtamayācata|| 27

अर्थ

उनका शरीर बिखरी हुई जटाओंसे और कृष्ण मृगचर्मसे ढका हुआ था। राजा परीक्षित‍्ने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्योंकि प्याससे उनका गला सूखा जा रहा था॥ २७॥

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