श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अहं हि पृष्टोऽर्यमणो भवद्भि-

राचक्ष आत्मावगमोऽत्र यावान्।

नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्त्रिण-

स्तथा समं विष्णुगतिं विपश्चितः॥ २३

ahaṃ hi pṛṣṭo'ryamaṇo bhavadbhi-

rācakṣa ātmāvagamo'tra yāvān|

nabhaḥ patantyātmasamaṃ patattriṇa-

stathā samaṃ viṣṇugatiṃ vipaścitaḥ|| 23

अर्थ

सूर्यके समान प्रकाशमान महात्माओ! आपलोगोंने मुझसे जो कुछ पूछा है, वह मैं अपनी समझके अनुसार सुनाता हूँ। जैसे पक्षी अपनी शक्तिके अनुसार आकाशमें उड़ते हैं, वैसे ही विद्वान्लोग भी अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार ही श्रीकृष्णकी लीलाका वर्णन करते हैं॥ २३॥

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