श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.42

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति।

प्रतिसंदध आश्वास्य३ महीं च समवर्धयत्॥ ४२

vṛṣasya naṣṭāṃstrīn pādān tapaḥ śaucaṃ dayāmiti|

pratisaṃdadha āśvāsya mahīṃ ca samavardhayat|| 42

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने इसके बाद वृषभरूप धर्मके तीनों चरण—तपस्या, शौच और दया जोड़ दिये और आश्वासन देकर पृथ्वीका संवर्धन किया॥ ४२॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—आस्थाय—

    (मुद्रित पृष्ठ 167)

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