॥ श्रीहरिः ॥
इति धर्मं महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथः।
निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे॥ २८
iti dharmaṃ mahīṃ caiva sāntvayitvā mahārathaḥ|
niśātamādade khaḍgaṃ kalaye'dharmahetave|| 28
अर्थ
महारथी परीक्षित्ने इस प्रकार धर्म और पृथ्वीको सान्त्वना दी। फिर उन्होंने अधर्मके कारणरूप कलियुगको मारनेके लिये तीक्ष्ण तलवार उठायी॥ २८॥
इति धर्मं महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथः।
निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे॥ २८
महारथी परीक्षित्ने इस प्रकार धर्म और पृथ्वीको सान्त्वना दी। फिर उन्होंने अधर्मके कारणरूप कलियुगको मारनेके लिये तीक्ष्ण तलवार उठायी॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 166) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/28/