श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निर्वर्तयेद्यतः।

तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः॥ २५

idānīṃ dharma pādaste satyaṃ nirvartayedyataḥ|

taṃ jighṛkṣatyadharmo'yamanṛtenaidhitaḥ kaliḥ|| 25

अर्थ

अब आपका चौथा चरण केवल ‘सत्य’ ही बच रहा है। उसीके बलपर आप जी रहे हैं। असत्यसे पुष्ट हुआ यह अधर्मरूप कलियुग उसे भी ग्रास कर लेना चाहता है॥ २५॥✎ 107

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #107 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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