अथवा यही सिद्धान्त निश्चित है कि प्राणियोंके मन और वाणीसे परमेश्वरकी मायाके स्वरूपका निरूपण नहीं किया जा सकता॥ २३॥✎ 107
अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा।
चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः॥ २३
अथवा यही सिद्धान्त निश्चित है कि प्राणियोंके मन और वाणीसे परमेश्वरकी मायाके स्वरूपका निरूपण नहीं किया जा सकता॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 165) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)