श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

न वयं क्लेशबीजानि यतः४ स्युः पुरुषर्षभ।

पुरुषं तं विजानीमो वाक्यभेदविमोहिताः॥ १८

na vayaṃ kleśabījāni yataḥ syuḥ puruṣarṣabha|

puruṣaṃ taṃ vijānīmo vākyabhedavimohitāḥ|| 18

अर्थ

नरेन्द्र! शास्त्रोंके विभिन्‍न वचनोंसे मोहित होनेके कारण हम उस पुरुषको नहीं जानते, जिससे क्लेशोंके कारण उत्पन्‍न होते हैं॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—यतस्व।

    (मुद्रित पृष्ठ 164)

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