जो उद्दण्ड व्यक्ति निरपराध प्राणियोंको दुःख देता है, वह चाहे साक्षात् देवता ही क्यों न हो, मैं उसकी बाजूबंदसे विभूषित भुजाको काट डालूँगा॥ १५॥
अनागस्स्विह भूतेषु य आगस्कृन्निरङ्कुशः।
आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साङ्गदम्॥ १५
जो उद्दण्ड व्यक्ति निरपराध प्राणियोंको दुःख देता है, वह चाहे साक्षात् देवता ही क्यों न हो, मैं उसकी बाजूबंदसे विभूषित भुजाको काट डालूँगा॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 164) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/15/