श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा-

मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्रः।

त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण

सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम्॥ ३४

yo vai mamātibharamāsuravaṃśarājñā-

makṣauhiṇīśatamapānudadātmatantraḥ|

tvāṃ duḥsthamūnapadamātmani pauruṣeṇa

sampādayan yaduṣu ramyamabibhradaṅgam|| 34

अर्थ

तुम अपने तीन चरणोंके कम हो जानेसे मन-ही-मन कुढ़ रहे थे; अतः अपने पुरुषार्थसे तुम्हें अपने ही अन्दर पुनः सब अंगोंसे पूर्ण एवं स्वस्थ कर देनेके लिये वे अत्यन्त रमणीय श्यामसुन्दर विग्रहसे यदुवंशमें प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भारको, जो असुरवंशी राजाओंकी सैकड़ों अक्षौहिणियोंके रूपमें था, नष्ट कर डाला। क्योंकि वे परम स्वतन्त्र थे॥ ३४॥

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