श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ज्ञानं विरक्तिरैश्‍वर्यं शौर्यं तेजो बलं४ स्मृतिः।

स्वातन्त्र्यं कौशलं का५न्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥ २७

jñānaṃ viraktiraiśvaryaṃ śauryaṃ tejo balaṃ smṛtiḥ|

svātantryaṃ kauśalaṃ kāntirdhairyaṃ mārdavameva ca|| 27

अर्थ

पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥

यह अर्थ श्लोक 25–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—धृतिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 161)
  2. ५

    प्रा० पा०—कान्तिः सौभाग्यं मार्दवं क्षमा।

    (मुद्रित पृष्ठ 161)

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