कुन्तीने भी अर्जुनके मुखसे यदुवंशियोंके नाश और भगवान्के स्वधामगमनकी बात सुनकर अनन्य भक्तिसे अपने हृदयको भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया और सदाके लिये इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे अपना मुँह मोड़ लिया॥ ३३॥✎ 103
पृथाप्यनुश्रुत्य धनञ्जयोदितं
नाशं यदूनां भगवद्गतिं च ताम्।
एकान्तभक्त्या भगवत्यधोक्षजे
निवेशितात्मोपरराम संसृतेः॥ ३३
कुन्तीने भी अर्जुनके मुखसे यदुवंशियोंके नाश और भगवान्के स्वधामगमनकी बात सुनकर अनन्य भक्तिसे अपने हृदयको भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया और सदाके लिये इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे अपना मुँह मोड़ लिया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 155) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/15/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)