श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

पृथाप्यनुश्रुत्य धनञ्जयोदितं

नाशं यदूनां भगवद्गतिं च ताम्।

एकान्तभक्‍त्या भगवत्यधोक्षजे

निवेशितात्मोपरराम संसृतेः॥ ३३

pṛthāpyanuśrutya dhanañjayoditaṃ

nāśaṃ yadūnāṃ bhagavadgatiṃ ca tām|

ekāntabhaktyā bhagavatyadhokṣaje

niveśitātmopararāma saṃsṛteḥ|| 33

अर्थ

कुन्तीने भी अर्जुनके मुखसे यदुवंशियोंके नाश और भगवान्‌के स्वधामगमनकी बात सुनकर अनन्य भक्तिसे अपने हृदयको भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया और सदाके लिये इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे अपना मुँह मोड़ लिया॥ ३३॥✎ 103

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #103 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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