उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके अहर्निश चिन्तनसे अत्यन्त बढ़ गयी। भक्तिके वेगने उनके हृदयको मथकर उसमेंसे सारे विकारोंको बाहर निकाल दिया॥ २९॥
वासुदेवाङ्घ्र्यनुध्यानपरिबृंहितरंहसा ।
भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः॥ २९
उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके अहर्निश चिन्तनसे अत्यन्त बढ़ गयी। भक्तिके वेगने उनके हृदयको मथकर उसमेंसे सारे विकारोंको बाहर निकाल दिया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 155) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/15/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)