श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.2

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

शोकेन शुष्यद्वदनहृत्सरोजो हतप्रभः।

विभुं तमेवानुध्यायन्‍नाशक्नोत्प्रतिभाषितुम्॥ २

śokena śuṣyadvadanahṛtsarojo hataprabhaḥ|

vibhuṃ tamevānudhyāyannāśaknotpratibhāṣitum|| 2

अर्थ

शोकसे अर्जुनका मुख और हृदय-कमल सूख गया था, चेहरा फीका पड़ गया था। वे उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके ध्यानमें ऐसे डूब रहे थे कि बड़े भाईके प्रश्नोंका कुछ भी उत्तर न दे सके॥ २॥✎ 94

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #94 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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