॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.17
सौत्ये वृतः कुमतिनाऽऽत्मद ईश्वरो मे
यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्याः।
मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठं
न प्राहरन् यदनुभावनिरस्तचित्ताः॥ १७
sautye vṛtaḥ kumatinā''tmada īśvaro me
yatpādapadmamabhavāya bhajanti bhavyāḥ|
māṃ śrāntavāhamarayo rathino bhuviṣṭhaṃ
na prāharan yadanubhāvanirastacittāḥ|| 17
अर्थ
श्रेष्ठ पुरुष संसारसे मुक्त होनेके लिये जिनके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, अपने-आपतकको दे डालनेवाले उन भगवान्को मुझ दुर्बुद्धिने सारथितक बना डाला। अहा! जिस समय मेरे घोड़े थक गये थे और मैं रथसे उतरकर पृथ्वीपर खड़ा था, उस समय बड़े-बड़े महारथी शत्रु भी मुझपर प्रहार न कर सके; क्योंकि श्रीकृष्णके प्रभावसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी॥ १७॥ ✎ 96 97