श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.40

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कच्चिन्‍नाभिहतोऽभावैः शब्दादिभिरमङ्गलैः।

न दत्तमुक्तमर्थिभ्य आशया यत्प्रतिश्रुतम्॥ ४०

kaccinnābhihato'bhāvaiḥ śabdādibhiramaṅgalaiḥ|

na dattamuktamarthibhya āśayā yatpratiśrutam|| 40

अर्थ

कहीं किसीने दुर्भावपूर्ण अमंगल शब्द आदिके द्वारा तुम्हारा चित्त तो नहीं दुखाया? अथवा किसी आशासे तुम्हारे पास आये हुए याचकोंको उनकी माँगी हुई वस्तु अथवा अपनी ओरसे कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके भी तुम नहीं दे सके?॥ ४०॥✎ 1859

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1859 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४३़॥ → ४३॥

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