श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

मङ्गलाय च लोकानां क्षेमाय च भवाय च।

आस्ते यदुकुलाम्भोधावाद्योऽनन्तसखः पुमान्॥ ३५

maṅgalāya ca lokānāṃ kṣemāya ca bhavāya ca|

āste yadukulāmbhodhāvādyo'nantasakhaḥ pumān|| 35

अर्थ

वे आदिपुरुष बलरामजीके साथ संसारके परम मंगल, परम कल्याण और उन्‍नतिके लिये यदुवंशरूप क्षीरसागरमें विराजमान हैं। उन्हींके बाहुबलसे सुरक्षित द्वारकापुरीमें यदुवंशीलोग सारे संसारके द्वारा सम्मानित होकर बड़े आनन्दसे विष्णुभगवान्‌के पार्षदोंके समान विहार कर रहे हैं॥ ३५-३६॥

यह अर्थ श्लोक 35–36 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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