॥ श्रीहरिः ॥
शूरो मातामहः कच्चित्स्वस्त्यास्ते वाथ मारिषः।
मातुलः सानुजः कच्चित्कुशल्यानकदुन्दुभिः॥ २६
śūro mātāmahaḥ kaccitsvastyāste vātha māriṣaḥ|
mātulaḥ sānujaḥ kaccitkuśalyānakadundubhiḥ|| 26
अर्थ
हमारे माननीय नाना शूरसेनजी प्रसन्न हैं? अपने छोटे भाईसहित मामा वसुदेवजी तो कुशलपूर्वक हैं?॥ २६॥
शूरो मातामहः कच्चित्स्वस्त्यास्ते वाथ मारिषः।
मातुलः सानुजः कच्चित्कुशल्यानकदुन्दुभिः॥ २६
हमारे माननीय नाना शूरसेनजी प्रसन्न हैं? अपने छोटे भाईसहित मामा वसुदेवजी तो कुशलपूर्वक हैं?॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.14.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 148) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/14/26/