॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.14.21
मन्य एतैर्महोत्पातैर्नूनं भगवतः पदैः।
अनन्यपुरुषश्रीभिर्हीना भूर्हतसौभगा॥ २१
manya etairmahotpātairnūnaṃ bhagavataḥ padaiḥ|
ananyapuruṣaśrībhirhīnā bhūrhatasaubhagā|| 21
अर्थ
इन बड़े-बड़े उत्पातोंको देखकर मैं तो ऐसा समझता हूँ कि निश्चय ही यह भाग्यहीना भूमि भगवान्के उन चरण-कमलोंसे, जिनका सौन्दर्य तथा जिनके ध्वजा, वज्र अंकुशादि-विलक्षण चिह्न और किसीमें भी कहीं भी नहीं हैं, रहित हो गयी है॥ २१॥