श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सूर्यं हतप्रभं पश्य ग्रहमर्दं मिथो दिवि।

ससङ्कुलैर्भूतगणैर्ज्वलिते इव रोदसी॥ १७

sūryaṃ hataprabhaṃ paśya grahamardaṃ mitho divi|

sasaṅkulairbhūtagaṇairjvalite iva rodasī|| 17

अर्थ

देखो! सूर्यकी प्रभा मन्द पड़ गयी है। आकाशमें ग्रह परस्पर टकराया करते हैं। भूतोंकी घनी भीड़में पृथ्वी और अन्तरिक्षमें आग-सी लगी हुई है॥ १७॥✎ 93

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #93 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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