देखो! सूर्यकी प्रभा मन्द पड़ गयी है। आकाशमें ग्रह परस्पर टकराया करते हैं। भूतोंकी घनी भीड़में पृथ्वी और अन्तरिक्षमें आग-सी लगी हुई है॥ १७॥✎ 93
सूर्यं हतप्रभं पश्य ग्रहमर्दं मिथो दिवि।
ससङ्कुलैर्भूतगणैर्ज्वलिते इव रोदसी॥ १७
देखो! सूर्यकी प्रभा मन्द पड़ गयी है। आकाशमें ग्रह परस्पर टकराया करते हैं। भूतोंकी घनी भीड़में पृथ्वी और अन्तरिक्षमें आग-सी लगी हुई है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.14.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 147) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/14/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)