श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.12

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

शिवैषोद्यन्तमा३दित्यमभिरौत्यनलानना ।

मामङ्ग४ सारमेयोऽयमभिरेभत्यभीरु५वत्॥ १२

śivaiṣodyantamādityamabhirautyanalānanā |

māmaṅga sārameyo'yamabhirebhatyabhīruvat|| 12

अर्थ

देखो, यह सियारिन उदय होते हुए सूर्यकी ओर मुँह करके रो रही है। अरे! उसके मुँहसे तो आग भी निकल रही है! यह कुत्ता बिलकुल निर्भय-सा होकर मेरी ओर देखकर चिल्ला रहा है॥ १२॥✎ 93

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—मरुणमभि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
  2. ४

    प्रा० पा०—ममाग्रे।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
  3. ५

    प्रा० पा०—भीत०।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #93 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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