॥ श्रीहरिः ॥
इत्युक्त्वाथारुहत्१ स्वर्गं नारदः सहतुम्बुरुः।
युधिष्ठिरो वचस्तस्य हृदि कृत्वाजहाच्छुचः॥ ५९
ityuktvāthāruhat svargaṃ nāradaḥ sahatumburuḥ|
yudhiṣṭhiro vacastasya hṛdi kṛtvājahācchucaḥ|| 59
अर्थ
देवर्षि नारद यों कहकर तुम्बुरुके साथ स्वर्गको चले गये। धर्मराज युधिष्ठिरने उनके उपदेशोंको हृदयमें धारण करके शोकको त्याग दिया॥ ५९॥✎ 92
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
नैमिषीयोपाख्याने त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
इत्युक्त्वाथारुहत् स्वर्गं नारदः सहतुम्बुरुः।
युधिष्ठिरो वचस्तस्य हृदि कृत्वाजहाच्छुचः॥ ५९
देवर्षि नारद यों कहकर तुम्बुरुके साथ स्वर्गको चले गये। धर्मराज युधिष्ठिरने उनके उपदेशोंको हृदयमें धारण करके शोकको त्याग दिया॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 145) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/59/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—इत्युक्त्वा चारुहत्।
(मुद्रित पृष्ठ 145)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #92 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की