श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.36

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सञ्जय उवाच

नाहं१ वेद व्यवसितं पित्रोर्वः कुलनन्दन।

गान्धार्या वा महाबाहो मुषितोऽस्मि महात्मभिः॥ ३६

nāhaṃ veda vyavasitaṃ pitrorvaḥ kulanandana|

gāndhāryā vā mahābāho muṣito'smi mahātmabhiḥ|| 36

अर्थ

संजय बोले—कुलनन्दन! मुझे आपके दोनों चाचा और गान्धारीके संकल्पका कुछ भी पता नहीं है। महाबाहो! मुझे तो उन महात्माओंने ठग लिया॥ ३६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्राचीन प्रतिमें ‘नाहं वेद....’ से लेकर....वहन्ति बलिमीशितुः॥’ यहाँतक पाँच श्लोक इस प्रकार मिलते हैं—

    ‘अहं व्यवसितं रात्रौ पित्रोस्ते कुलनन्दन। न वेद साध्व्या गान्धार्या मुषितोऽस्मि महात्मभिः॥

    एतस्मिन्‍नन्तरे विप्र नारदः प्रत्यदृश्यत। वीणां त्रितन्त्रीं ध्वनयन् भगवान् सहतुम्बुरुः॥

    राजा नत्वोपनीतार्घ्यः प्रत्युत्थायाभिवन्दितम्। परमासन आसीनं पौरवेन्द्रोऽभ्यभाषत॥

    नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवन् क्‍व गताविति। कर्णधार इवापारे सीदतां पारदर्शकः॥

    नारद उवाच—

    ‘मा कञ्चन शुचो राजन् यदीश्‍वरवशे जगत्। लोकाः सपाला यस्येमे वहन्ति बलिमीशितुः’

     

    (मुद्रित पृष्ठ 143)

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