श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सूत उवाच

कृपया स्नेहवैक्लव्यात्सूतो विरहकर्शितः।

आत्मेश्‍वरमचक्षाणो न प्रत्याहातिपीडितः॥ ३४

kṛpayā snehavaiklavyātsūto virahakarśitaḥ|

ātmeśvaramacakṣāṇo na pratyāhātipīḍitaḥ|| 34

अर्थ

सूतजी कहते हैं—संजय अपने स्वामी धृतराष्ट्रको न पाकर कृपा और स्नेहकी विकलतासे अत्यन्त पीड़ित और विरहातुर हो रहे थे। वे युधिष्ठिरको कुछ उत्तर न दे सके॥ ३४॥

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