श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्‍निर्विप्रान् नत्वा तिल२गोभूमिरुक्मैः।✎ 1528

गृहं प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च॥ ३०

ajātaśatruḥ kṛtamaitro hutāgnirviprān natvā tilagobhūmirukmaiḥ|

gṛhaṃ praviṣṭo guruvandanāya na cāpaśyatpitarau saubalīṃ ca|| 30

अर्थ

अजातशत्रु युधिष्ठिरने प्रातःकाल सन्ध्या-वन्दन तथा अग्‍निहोत्र करके ब्राह्मणोंको नमस्कार किया और उन्हें तिल, गौ, भूमि और सुवर्णका दान दिया। इसके बाद जब वे गुरुजनोंकी चरणवन्दनाके लिये राजमहलमें गये, तब उन्हें धृतराष्ट्र, विदुर तथा गान्धारीके दर्शन नहीं हुए॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—वसु।

    (मुद्रित पृष्ठ 142)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1528 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हुताग्‍नि- र्विप्रान् → हुताग्‍निर्विप्रान्

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