कालके वशीभूत होकर जीवका अपने प्रियतम प्राणोंसे भी बात-की-बातमें वियोग हो जाता है; फिर धन, जन आदि दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या है॥ २०॥✎ 8990
येन चैवाभिपन्नोऽयं प्राणैः प्रियतमैरपि।
जनः सद्यो वियुज्येत किमुतान्यैर्धनादिभिः॥ २०
कालके वशीभूत होकर जीवका अपने प्रियतम प्राणोंसे भी बात-की-बातमें वियोग हो जाता है; फिर धन, जन आदि दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 141) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)