श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

येन चैवाभिपन्‍नोऽयं प्राणैः प्रियतमैरपि।

जनः सद्यो वियुज्येत किमुतान्यैर्धनादिभिः॥ २०

yena caivābhipanno'yaṃ prāṇaiḥ priyatamairapi|

janaḥ sadyo viyujyeta kimutānyairdhanādibhiḥ|| 20

अर्थ

कालके वशीभूत होकर जीवका अपने प्रियतम प्राणोंसे भी बात-की-बातमें वियोग हो जाता है; फिर धन, जन आदि दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या है॥ २०॥✎ 89 90

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #89 शब्दोंके बीचका स्थान: कोधारणकर → को धारणकर
  • #90 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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