इस प्रकार पाण्डव गृहस्थके काम-धंधोंमें रम गये और उन्हींके पीछे एक प्रकारसे यह बात भूल गये कि अनजानमें ही हमारा जीवन मृत्युकी ओर जा रहा है; अब देखते-देखते उनके सामने वह समय आ पहुँचा जिसे कोई टाल नहीं सकता॥ १७॥
एवं गृहेषु सक्तानां प्रमत्तानां तदीहया।
अत्यक्रामदविज्ञातः कालः परमदुस्तरः॥ १७
इस प्रकार पाण्डव गृहस्थके काम-धंधोंमें रम गये और उन्हींके पीछे एक प्रकारसे यह बात भूल गये कि अनजानमें ही हमारा जीवन मृत्युकी ओर जा रहा है; अब देखते-देखते उनके सामने वह समय आ पहुँचा जिसे कोई टाल नहीं सकता॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 141) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/17/