युधिष्ठिरके निमन्त्रणसे पधारे हुए भगवान् ब्राह्मणोंद्वारा उनका यज्ञ सम्पन्न कराकर अपने सुहृद् पाण्डवोंकी प्रसन्नताके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे॥ ३५॥✎ 8788
आहूतो भगवान् राज्ञा याजयित्वा द्विजैर्नृपम्।
उवास कतिचिन्मासान् सुहृदां प्रियकाम्यया॥ ३५
युधिष्ठिरके निमन्त्रणसे पधारे हुए भगवान् ब्राह्मणोंद्वारा उनका यज्ञ सम्पन्न कराकर अपने सुहृद् पाण्डवोंकी प्रसन्नताके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.12.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 138) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/12/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)