इसी समय स्वजनोंके वधका प्रायश्चित्त करनेके लिये राजा युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करनेका विचार किया, परन्तु प्रजासे वसूल किये हुए कर और दण्ड (जुर्माने)-की रकमके अतिरिक्त और धन न होनेके कारण वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ ३२॥✎ 8788
यक्ष्यमाणोऽश्वमेधेन ज्ञातिद्रोहजिहासया।
राजालब्धधनो दध्यावन्यत्र करदण्डयोः॥ ३२
इसी समय स्वजनोंके वधका प्रायश्चित्त करनेके लिये राजा युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करनेका विचार किया, परन्तु प्रजासे वसूल किये हुए कर और दण्ड (जुर्माने)-की रकमके अतिरिक्त और धन न होनेके कारण वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.12.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 138) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/12/32/