॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.9
यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान् कुरून् मधून् वाथ सुहृद्दिदृक्षया।
तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद् रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत१॥ ९
yarhyambujākṣāpasasāra bho bhavān kurūn madhūn vātha suhṛddidṛkṣayā|
tatrābdakoṭipratimaḥ kṣaṇo bhaved raviṃ vinākṣṇoriva nastavācyuta|| 9
अर्थ
कमलनयन श्रीकृष्ण! जब आप अपने बन्धु-बान्धवोंसे मिलनेके लिये हस्तिनापुर अथवा मथुरा (व्रजमण्डल) चले जाते हैं, तब आपके बिना हमारा एक-एक क्षण कोटि-कोटि वर्षोंके समान लम्बा हो जाता है। आपके बिना हमारी दशा वैसी हो जाती है, जैसे सूर्यके बिना आँखोंकी॥ ९॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—प्राचीन प्रतिमें नवम श्लोकके बाद एक श्लोक अधिक है, जो इस प्रकार है—‘कथं
वयं नाथ चिरोषिते त्वयि प्रसन्नदृष्ट्याखिलतापशोषणम्। जीवाम ते सुन्दरहासशोभितमपश्यमाना वदनं मनोहरम्॥’