॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.6
नताः स्म ते नाथ सदाङ्घ्रिपङ्कजं विरिञ्चवैरिञ्च्यसुरेन्द्रवन्दितम् ।
परायणं क्षेममिहेच्छतां परं न यत्र कालः प्रभवेत् परः२ प्रभुः॥ ६
natāḥ sma te nātha sadāṅghripaṅkajaṃ viriñcavairiñcyasurendravanditam |
parāyaṇaṃ kṣemamihecchatāṃ paraṃ na yatra kālaḥ prabhavet paraḥ prabhuḥ|| 6
अर्थ
‘स्वामिन्! हम आपके उन चरणकमलोंको सदा-सर्वदा प्रणाम करते हैं जिनकी वन्दना ब्रह्मा, शंकर और इन्द्रतक करते हैं, जो इस संसारमें परम कल्याण चाहनेवालोंके लिये सर्वोत्तम आश्रय हैं, जिनकी शरण ले लेनेपर परम समर्थ काल भी एक बालतक बाँका नहीं कर सकता॥ ६॥
टिप्पणियाँ
- २
परः प्रभो।