श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद‍्गुणैः।

न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥ ३८

etadīśanamīśasya prakṛtistho'pi tadguṇaiḥ|

na yujyate sadā''tmasthairyathā buddhistadāśrayā|| 38

अर्थ

यही तो भगवान्‌की भगवत्ता है कि वे प्रकृतिमें स्थित होकर भी उसके गुणोंसे कभी लिप्त नहीं होते, जैसे भगवान्‌की शरणागत बुद्धि अपनेमें रहनेवाले प्राकृत गुणोंसे लिप्त नहीं होती॥ ३८॥✎ 83 84

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #83 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #84 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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